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मंगलवार, 10 जुलाई 2007

लेबर चौक

शहर की इसी ख़ास जगह पर
लगता है रोज़ मजदूर बाज़ार
मेहनती लोगों की दुकान
सजती है रोज़
बेंचे जाते हैं लोग
मजदूरी के लिये
दाम लगते हैं
मोल भाव होता है
आदमी का ख़ून पसीना
और मेहनत
सब कुछ नीलाम होता है
सीमेंट के शहरी जंगल को
और भी चिकना करने के लिये
आदमी को आदमी ख़रीदता है
बेजान इमारत के लिये

7 टिप्‍पणियां:

maithily ने कहा…

हिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है नमिता जी

Udan Tashtari ने कहा…

स्वागत है हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका.

नमिता राकेश ने कहा…

sorry i m late to read your comment....aapka swagat accha laga...thanks.

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी. स्वागत है आपका.

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

लीजिये मैं भी आ टपका आपके ब्लॉग पर. आपकी किताब तो मैंने पूरी की पूरी चाट ली है - अब जरा जल्दी जल्दी ब्लॉग पर भी लिखा करिये.

नमिता राकेश ने कहा…

main phir late ho gai kher der ayed durust ayed kya karun is chitha jagat me aane se pehele or bhut se chithe likhne parte hain ghar ke naam off ke naam kavi smmelnon ke naam or jb mood banta hai aap sabse chithapa karne ka tab tak light apna chitha gol kar deti hai o k by phir milenge par aap kyon chup ho jate ho?

kalaam-e-sajal ने कहा…

kal ki kavya goshthi me aapse mulakaat hui thi. Aaj aapke blog ko dekhne ka mauka mila. is kavita ko pad kar kuch purani panktiyaan yaag aa gayeen.

ये महानगर है
मिटटी भी यहाँ की सोना है
गगनचुम्बी हैं भवन
आदमी बौना है ।

dr jagmohan rai