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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ग़ज़ल
अपनी क्या तकदीर जनाब

हवा में जैसे तीर जनाब

कुछ ग़ज़लें कुछ गीत फकत

है अपनी जागीर जनाब


लफ्जों के वो बानी थे

क्या ग़ालिब क्या मीर जनाब


जंग मुहब्बत से जीतो

छोडो भी शमशीर जनाब


प्यार की धारा बह निकले

कीजे वो तदबीर जनाब


खाब जो कल मैंने देखा

तुम उसकी ताबीर जनाब


शेर नमिता के जैसे
तरकश के हों तीर जनाब

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5 टिप्‍पणियां:

sandhyagupta ने कहा…

Achcha laga aapke blog par aakar.Shubkamnayen.

amarjeet kaunke ने कहा…

teer shabad kaa upyog apne bahut khubsurti se kiya....sachmuch teer maar dia jnaab.....

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi ने कहा…

नमिता राकेश जी
आदाब
आपका ब्लाग और सभी कविताऐँ बहुत पसंद आईँ।
आपके पूरे होँ सब ख़्वाब
अच्छी हो ताबीर जनाब
हार्दिक बधाई
अहमद अली बर्क़ी आज़मी

नमिता राकेश ने कहा…

g, shukriya jnab
vese apni kya aukat jnab?

vikas ने कहा…

achi rachna ke liye aapko badhaai....