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रविवार, 9 मई 2010

नमस्कार
इस अवसर पर मेरी भी एक रचना प्रस्तुत है
पुनरावृत्ति
जब भी खोलती हूँ
जिंदगी की किताब के
शुरूआती पन्नों को
मेरी आँखें नाम हो जाती हैं
मन के कैनवास पर
कुछ तस्वीरें चलचित्र की भांति
सजीव हो उठती हैं
वो मेरा मुंह मै अंगूठा दबा कर
मां,तुम्हारी गोद में सोना
तुम्हारी ऊँगली पकड़ कर
लडखडाते अबोध पैरों का
पहली बार धरती पर खड़े होना
तुम्हारा पल्लू पकडे पकडे
पूरे घर में
तुम्हारे पीछे पीछे घूमना
बस्ता लेकर स्कूल जाते हुए
गली के आखरी छोर तक
तुम्हे मुड़ मुड़ के निहारना
कुछ और पन्ने पलटने पर
दिखाई पड़ता है
मेरा बड़ा होना
और बड़े होकर
ससुराल चले जाना
एक बेटी का खुद मां बनना
और ........
फिर वही गोद
वही ऊँगली
वही ममतामई नज़रें
वही सम्बल
वही विश्वास
उन्ही सम्वेदनाओं की
पुनरावृत्ति
द्वारा-नमिता राकेश

1 टिप्पणी:

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना..बधाई.

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'पाखी की दुनिया' में इस बार 'कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी' !